बिलासपुर | 2 जनवरी : साय सरकार के कार्यकाल में बिलासपुर तहसील से एक गंभीर राजस्व प्रकरण सामने आया है, जहाँ टीम सीमांकन से संतुष्ट आवेदक को सीमांकन रिपोर्ट देने के बजाय जबरन पुनः दल सीमांकन कराया गया। मामला करबला क्षेत्र स्थित भूमि का है, जो पूर्व पार्षद एवं भाजपा के वरिष्ठ पार्टी सदस्य शिव प्रताप साव के नाम पर दर्ज है।

राजस्व नियमों के अनुसार भूमि की नाप-जोख व सीमांकन की जिम्मेदारी राजस्व निरीक्षक एवं पटवारी की होती है। टीम सीमांकन पूर्ण होने के बाद रिपोर्ट तहसील में जमा की जाती है, जिसे नस्ती कर आवेदक को उपलब्ध कराना तहसीलदार का दायित्व होता है। लेकिन आरोप है कि बिलासपुर तहसीलदार प्रकाश साहू ने स्थापित प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए रिपोर्ट रोक दी और आवेदक के संतुष्ट होने के बावजूद पुनः टीम सीमांकन का आदेश दे दिया।

जानकारी के अनुसार, मौजा जूना बिलासपुर, हल्का करबला स्थित खसरा नंबर 275/2 (रकबा 0.1130 हेक्टेयर) भूमि का 15 अक्टूबर 2025 को 7 सदस्यीय आरआई-पटवारी टीम द्वारा सीमांकन किया गया था। सीमांकन में यह पाया गया कि खसरा नंबर 277 के भू-स्वामी चिमन रावलानी द्वारा खसरा नंबर 275 के हिस्से पर कब्जा किया गया है। इसके बावजूद, संबंधित खसरे के भू-स्वामी न होने के बाद भी उनकी आपत्ति को स्वीकार कर लिया गया, जो राजस्व नियमों के विपरीत बताया जा रहा है।

आरोप है कि सीमांकन रिपोर्ट दबाने और भूमि को विवादित बनाए रखने के उद्देश्य से तहसीलदार द्वारा 12 दिसंबर को पुनः दल सीमांकन का नोटिस जारी किया गया। शुक्रवार, 2 जनवरी को जब नई टीम मौके पर पहुंची तो सीमांकन की प्रक्रिया शुरू होते ही तहसीलदार का फोन आने के बाद टीम कार्य रोककर बिखर गई। आरोप है कि आधा-अधूरा सीमांकन कर केवल औपचारिकता निभाई गई, जिसके बाद तैयार पंचनामा पर आवेदक पक्ष ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया।
पूर्व पार्षद शिव प्रताप साव द्वारा सीमांकन रिपोर्ट के लिए कलेक्टर को आवेदन भी दिया जा चुका है, लेकिन इसके बावजूद तहसील स्तर पर प्रकरण को लंबित रखा गया है। पूरे घटनाक्रम ने बिलासपुर तहसील की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
खसरा 275 का सीमांकन, खसरा 277 की आपत्ति स्वीकार करना नियमविरुद्ध
सीमांकन के दौरान उपस्थित आवेदक के पुत्र अवनीश साव ने बताया कि जब एक बार टीम सीमांकन हो चुका हो और आवेदक संतुष्ट हो, तो नियमतः पुनः सीमांकन नहीं कराया जाता। यदि आपत्ति आती है तो उसका निराकरण प्रकरण दर्ज कर सुनवाई के माध्यम से किया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि जानबूझकर उनकी भूमि को सीमांकन के नाम पर विवादित किया जा रहा है, जबकि आपत्तिकर्ता संबंधित खसरे का भू-स्वामी ही नहीं है।
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